मनुस्मृति २५-११-२०१९

अध्याय २

Cessante Ratione Legis, Cessat Ipsa Lex
: the reason of the law ceasing, the law itself ceases


१. संस्कार              

1.      विधि की शुरुवात

एषा धर्मस्य वो योनिः समासेन प्रकीर्तित
संभवश्चास्य सर्वस्य वर्णधर्मान्निबोधत  ॥ २.२५ ॥

2.      संस्कारविधान

वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् ।
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च  ॥ २.२६ ॥
                   

3.      संस्कार का कारण

गार्भैर्होमैर्जातकर्म- चौडमौञ्जीनिबन्धनैः 
बैजिकं गार्भिकं चैनो द्विजानामपमृज्यते  ॥ २.२७ ॥
                   

4.      संस्कार का कारण

स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः 
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः  ॥ २.२८ ॥

5.      जातकर्म संस्कार

प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते 
मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिषाम्  ॥ २.२९ ॥
                   

6.      नामकरण संस्कार

नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वास्य कारयेत् ।
पुण्ये तिथौ मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते  ॥ २.३० ॥

7.      स्त्रियों का नामकरण

स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम् 
मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ॥ २.३३ ॥
                   

8.      अन्नप्राशन संस्कार

चतुर्थे मासि कर्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् ।
षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यद्वेष्टं मङ्गलं कुले  ॥ २.३४ ॥
                   

9.      चूडाकरणसंस्कार

चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः 
प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्तव्यं श्रुतिचोदनात् ॥ २.३५ ॥
                   

10.उपनयन संस्कार

ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यो विप्रस्य पञ्चमे 
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे  ॥ २.३७ ॥
                     

11.यज्ञोपवीतसंस्कार के बाद के कर्तव्य

उपनीय गुरुः शिष्यं शिक्षयेच्छौचमादितः 
आचारमग्निकार्यं च संध्योपासनमेव च  ॥ २.६९ ॥

२. ब्रह्मचारी           

12.ब्रह्मचारी के वस्त्र      

कार्ष्णरौरवबास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः 
वसीरन्नानुपूर्व्येण शाणक्षौमाविकानि च  ॥ २.४१ ॥

13.मेखला         

मौञ्जी त्रिवृत्समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला 
क्षत्रियस्य तु मौर्वी ज्या वैश्यस्य शणतान्तवी  ॥ २.४२ ॥

14.मेखला का प्रतिनिधि          

मुञ्जालाभे तु कर्तव्याः कुशाश्मन्तकबल्वजैः 
त्रिवृता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव वा  ॥ २.४३ ॥

15.यज्ञोपवीत

कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् ।
शणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसौत्रिकम्  ॥ २.४४ ॥

16.दंडमान         

केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणतः 
ललाटसम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः  ॥ २.४६ ॥

17.दंडमान  कैसा हो      

ऋजवस्ते तु सर्वे स्युरव्रणाः सौम्यदर्शनाः 
अनुद्वेगकरा नॄणां सत्वचोऽनग्निदूषिताः  ॥ २.४७ ॥

18.उपविती  के लक्ष्ण    

उद्धृते दक्षिने पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः 
सव्ये प्राचीनावीती निवीती कण्ठसज्जने  ॥ २.६३ ॥

19.ब्रह्मचारी के तीन प्रकार       

मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथ वा स्याच्छिखाजटः 
नैनं ग्रामेऽभिनिम्लोचेत्सूर्यो नाभ्युदियात्क्व चित् ॥ २.२१९ ॥

३. संस्कार ना होने के परिणाम              

20.व्रात्य  

अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः 
सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः  ॥ २.३९ ॥

४. भिक्षा विधि और भोजन विधि                   

21.प्रथम भिक्षा किनसे मांगे      

मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् 
भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं नावमानयेत् ॥ २.५० ॥

22.भिक्षा द्रव्य की सेवन विधि  

समाहृत्य तु तद्भैक्षं यावदन्नममायया 
निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः  ॥ २.५१ ॥

23.पूर्व दिशा की और मुह करके भोजन करना

आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः 
श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते ह्युदङ्मुखः  ॥ २.५२ ॥

24.भोजन के अंत में आचमन    

उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः 
भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत् ॥ २.५३ ॥

25.श्रद्धा से भोजन         

पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् 
दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः  ॥ २.५४ ॥

26.भोजन के अन्य नियम         

नोच्छिष्टं कस्य चिद्दद्यान्नाद्यादेतत्तथान्तरा 
न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्व चिद्व्रजेत् ॥ २.५६ ॥

27.अधिक भोजन का निषेध     

अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् 
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ २.५७ ॥

28.आचमन के योग्य तीर्थ        

ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत् ।
कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदा चन  ॥ २.५८ ॥

29.तीर्थो के लक्षण        

अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्मं तीर्थं प्रचक्षते 
कायमङ्गुलिमूलेऽग्रे देवं पित्र्यं तयोरधः  ॥ २.५९ ॥

30.आचमन विधि         

त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यात्ततो मुखम् 
खानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मानं शिर एव च  ॥ २.६० ॥

31.भिक्षा योग्य घर        

वेदयज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु 
ब्रह्मचार्याहरेद्भैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम्  ॥ २.१८३ ॥

५. अध्ययन विधि            

32.वेद अध्ययन विधि

अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः 
ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लघुवासा जितेन्द्रियः  ॥ २.७० ॥

33.ब्रह्म्नांजलि   

ब्रह्मारम्भेऽवसाने च पादौ ग्राह्यौ गुरोः सदा 
संहत्य हस्तावध्येयं स हि ब्रह्माञ्जलिः स्मृतः  ॥ २.७१ ॥

34.गुरु के अभिवादन की विधि

व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः 
सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः  ॥ २.७२ ॥

35.अध्ययन का आरम्भ और समाप्ति    

अध्येष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः 
अधीष्व भो इति ब्रूयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत् ॥ २.७३ ॥

36.बिना पूछे उत्तर न देना

नापृष्टः कस्य चिद्ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः 
जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत् ॥ २.११० ॥

37.पालन ना करने हानि

अधर्मेण च यः प्राह यश्चाधर्मेण पृच्छति 
तयोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं वाधिगच्छति  ॥ २.१११ ॥

38.विधादान की विफलता       

धर्मार्थौ यत्र न स्यातां शुश्रूषा वापि तद्विधा 
तत्र विद्या न वप्तव्या शुभं बीजमिवोषरे  ॥ २.११२ ॥

39.शिष्यों से मधुर भाषण         

यस्य वाङ्गनसी शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा 
स वै सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम्  ॥ २.१६० ॥

40.वेदाभ्यास

वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्स्यन् द्विजोत्तमः 
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते  ॥ २.१६६ ॥

41.वेदाभ्यास

आ हैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः 
यः स्रग्व्यपि द्विजोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम्  ॥ २.१६७ ॥

42.वेदाभ्यास     

योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् 
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः  ॥ २.१६८ ॥

43.द्विज तत्व निरूपण

मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धने  । तृतीयं यज्ञदीक्षायां द्विजस्य श्रुतिचोदनात् ॥ २.१६९ ॥

44.गुरु दक्षिणा   

न पूर्वं गुरवे किं चिदुपकुर्वीत धर्मवित् ।
स्नास्यंस्तु गुरुणाज्ञप्तः शक्त्या गुर्वर्थमाहरेत् ॥ २.२४५ ॥

45.शिक्षा ग्रहण   

यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयः किं चित्समाचरेत् ।
तत्सर्वमाचरेद्युक्तो यत्र चास्य रमेन्मनः  ॥ २.२२३ ॥

46.त्रिवर्ग

धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थौ धर्म एव च 
अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थितिः  ॥ २.२२४ ॥

६. प्रणाम करने की विधि            

47.अध्यापक की मान्यता

लौकिकं वैदिकं वापि तथाध्यात्मिकमेव वा 
आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत् ॥ २.११७ ॥

48.प्रणाम करने की विधि         

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः 
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्धर्मो यशो बलम्  ॥ २.१२१ ॥

49.प्रणाम करने की विधि         

आयुष्मान् भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने 
अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः  ॥ २.१२५ ॥

50.स्त्री से संभाषण        

परपत्नी तु या स्त्री स्यादसंबन्धा च योनितः 
तां ब्रूयाद्भवतीत्येवं सुभगे भगिनीति च  ॥ २.१२९ ॥

51.विद्धा की महता       

वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी 
एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम्  ॥ २.१३६ ॥

52.पहले मार्ग देना         

चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः 
स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च  ॥ २.१३८ ॥

७. गुरु की आज्ञा पालन अन्य नियमो का पालन                  

53.माता पिता भाई और गुरु     

आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः 
माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः  ॥ २.२२६ ॥

54.ज्ञान प्राप्त करना       

विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् 
अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम्  ॥ २.२३९ ॥

55.ज्ञान प्राप्त करना       

स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् 
विविधानि च शील्पानि समादेयानि सर्वतः  ॥ २.२४० ॥

८. ज्ञान की महिमा          

56.अज्ञानी         

अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः 
अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम्  ॥ २.१५३ ॥

57.अवस्था की अपेक्षा ज्ञान     

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः 
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान्  ॥ २.१५४ ॥

58.ज्ञान   

विप्राणां ज्ञानतो, ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः वैश्यानां धान्यधनतः॥ २.१५५ ॥

59.मुर्ख की निंदा

यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः 
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति  ॥ २.१५७ ॥

९. नियमो का पालन

60.नियमो का पालन

सेवेतेमांस्तु नियमान् ब्रह्मचारी गुरौ वसन् 
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं तपोवृद्ध्यर्थमात्मनः  ॥ २.१७५ ॥

61.संध्या विधि

पूर्वां संध्यां जपांस्तिष्ठेत्सावित्रीमार्कदर्शनात् ।
पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥ २.१०१ ॥

62.दोष नाश       

पूर्वां संध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति 
पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम्  ॥ २.१०२ ॥

१०. शिक्षक के लक्षण                

63.आचार्य का लक्षण उपनीय

तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्द्विजः 
सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्यं प्रचक्षते  ॥ २.१४० ॥

64.उपाध्याय

एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः 
योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते  ॥ २.१४१ ॥

65.ऋत्विक        

अग्न्याधेयं पाकयज्ञानग्निष्टोमादिकान्मखान् 
यः करोति वृतो यस्य स तस्य र्त्विगिहोच्यते  ॥ २.१४३ ॥

66.आचार्य का लक्षण

य आवृणोत्यवितथं ब्रह्मणा श्रवणावुभौ 
स माता स पिता ज्ञेयस्तं न द्रुह्येत्कदा चन  ॥ २.१४४ ॥

67.माता की श्रेष्ठता       

उपाध्यायान् दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता 
सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते  ॥ २.१४५ ॥

68.पिता से आचार्य के   

उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता 
ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम्  ॥ २.१४६ ॥

69.पिता से आचार्य के   

कामान्माता पिता चैनं यदुत्पादयतो मिथः 
संभूतिं तस्य तां विद्याद्यद्योनावभिजायते  ॥ २.१४७ ॥

70.आचार्य का लक्षण   

आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद्वेदपारगः 
उत्पादयति सावित्र्या सा सत्या साजरामरा  ॥ २.१४८ ॥

71.गुरु     

निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि 
संभावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते  ॥ २.१४२ ॥

72.गुरु     

अल्पं वा बहु वा यस्य श्रुतस्योपकरोति यः 
तमपीह गुरुं विद्याच्छ्रुतोपक्रियया तया  ॥ २.१४९ ॥

73.गुरु     

ब्राह्मस्य जन्मनः कर्ता स्वधर्मस्य च शासिता 
बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः  ॥ २.१५० ॥
                             


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