चौसठ कलाएँ
प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था एक अत्यन्त व्यापक तथा बहुआयामी प्रणाली थी। इसमें केवल शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं, अपितु जीवनोपयोगी लौकिक विद्याओं का भी सम्यक् समावेश था। इन लौकिक विद्याओं में विविध कलाओं की शिक्षा को विशेष महत्व प्राप्त था।
काव्यशास्त्र के आचार्य दण्डी ने काव्यादर्श में स्पष्ट किया है कि नृत्य, गीत आदि कलाएँ काम एवं अर्थ के आश्रय में विकसित होती हैं—“नृत्यगीतप्रभृतयः कलाः कामार्थसंश्रयाः।” इस कथन से यह ज्ञात होता है कि कला न केवल आत्मानंद की अनुभूति है, अपितु जीवन के व्यवहारिक पक्षों से भी उसका घनिष्ठ संबंध है।
श्रीमद्भागवत के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण विद्या अध्ययन हेतु अवन्तिकापुरी (उज्जैन) में स्थित महर्षि सन्दीपनि के आश्रम में गए, तब उन्होंने केवल ६४ दिनों में ६४ कलाओं का अर्जन कर लिया था। कल्कि पुराण में वर्णन मिलता है कि कलियुग के अंत में जब भगवान श्री कल्कि अवतार लेंगे, तब वे भी इन ६४ कलाओं में निपुण होंगे।
भारतीय साहित्य में इन कलाओं का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। रामायण, महाभारत जैसे आर्षग्रंथों के अतिरिक्त अनेक पुराणों एवं काव्यग्रंथों में भी इनका उल्लेख हुआ है। यद्यपि कलाएँ अनंत मानी गई हैं, तथापि प्रमुख और प्रभावशाली कलाओं की गणना करना सदैव उपयोगी रहा है।
प्रसिद्ध कामशास्त्र कामसूत्र में इन ६४ कलाओं का क्रमबद्ध रूप से वर्णन किया गया है। यही संख्या प्रबन्ध कोश (एक जैन ग्रंथ) तथा शुक्रनीति सार में भी प्राप्त होती है। बौद्ध ग्रंथ ललितविस्तर में तो कलाओं की संख्या ८६ तक वर्णित है। वहीं, शैव तांत्रिक परंपरा में भी ६४ कलाओं का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। ललितासहस्रनाम में देवी को इन चौंसठ कलाओं की साक्षात् मूर्ति कहा गया है।
६४ कलाओं को ६ प्रमुख श्रेणियों में विभाजित करके प्रस्तुत किया गया है, जिससे इनकी प्रकृति और उपयोगिता को और स्पष्ट रूप से समझा जा सके:
🪕 1. संगीत, नृत्य एवं अभिनय कला (Performing Arts)
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गीतम् (गायन)
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वाद्यं (वाद्य बजाना)
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नृत्यम् (नृत्य)
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नाट्यम् (नाटक)
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धूपतंत्र (धूप/सुगंध के साथ नाट्य-सज्जा)
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चित्रकथा (चित्रों के माध्यम से कहानी कहना)
🎨 2. चित्र, शिल्प एवं सज्जा कला (Visual & Decorative Arts)
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आलेख्यं (चित्रकला)
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पुष्पास्तरणं (फूलों से सजावट)
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मल्लिकाकर्म (माला बनाना)
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भूषणयोजना (आभूषण बनाना)
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गन्धयुक्तिः (सुगंध बनाना)
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वस्त्रगोपनं (वस्त्र संग्रह)
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रूपरचनं (वस्त्र या वस्तुओं की डिजाइन)
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माल्यगुणविकारः (पुष्पगुच्छ सज्जा)
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सज्जा कला
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शयन रचना
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तण्डुलकुसुमबलिविकारः (अन्न व पुष्पों से मंडप सज्जा)
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काचकर्म (काँच कला)
📜 3. साहित्य, संवाद एवं बौद्धिक कलाएँ (Literary & Intellectual Arts)
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काव्यालंकार (काव्य एवं अलंकार शास्त्र)
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उपन्यास कला (संवाद-कला)
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काव्यरचना (कविता लेखन)
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पत्रलेखन
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हस्तलेखन
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नीतिशास्त्र
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गणित
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देशभाषाज्ञानं
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संकेतज्ञा
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कूत्तन (कोड भाषा)
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मनोविज्ञानं
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धार्य वस्त्र विधि
🧵 4. घरेलू, पाक एवं जीवनोपयोगी कलाएँ (Domestic & Practical Arts)
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भक्ष्यपाक (खाना बनाना)
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पानकर्म (पेय निर्माण)
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गन्धयोजनं
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दौत्यकर्म (संदेश लाना-ले जाना)
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वस्तुनिर्माण
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रत्नपरीक्षा (रत्नों की परख)
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वस्त्र धुलाई / रंगाई
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तम्बूल रचना (पान सजाना)
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विन्यास (वस्त्र विन्यास)
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कर्णपथ्रकविधानं
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विशेषकच्छेद्यं (वस्त्र अलंकरण)
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दाशकर्म (घरेलू सेवा)
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सौजन्य (शिष्टाचार)
🛡️ 5. शस्त्र, युद्ध एवं कौशल (Martial & Strategic Skills)
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अस्त्रविद्या
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हस्तयुद्ध
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अपराजितास्त्र
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यन्त्रज्ञान
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दुर्ग निर्माण
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आयुर्वेद
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रसायन विद्या
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घुड़सवारी
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हत्ती की सवारी
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रथसंचालन
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नाव संचालन
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इन्द्रजालं (जादू कला)
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समवाय (कूटनीति व मेलजोल)
🧘 6. आध्यात्मिक, तांत्रिक एवं रहस्यमय कलाएँ (Spiritual & Esoteric Arts)
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जैन कर्म (धार्मिक अनुष्ठान)
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ललितविस्तर ज्ञान
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वास्तुज्ञानं
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वृक्षकर्म (बागवानी)
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चित्रशास्त्र (आंतरिक सज्जा आदि का ज्ञान)
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धारणमन्त्र (रक्षा मंत्र)
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रत्न शोधन
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देव-पूजन / मन्त्र-सिद्धि
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